Alif Laila Story - ( Part - 4 ) कमरुज्जमां और बदौरा की कहानी
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| Alif Laila Story - ( Part - 4 ) कमरुज्जमां और बदौरा की कहानी |
इस पर कमरुज्जमां ने खुद मर्जुबन से मिलने का फैसला किया और वहां पहुंच गया जहां मर्जुबन को ठहराया गया था। शहजादे नें मर्जुबन से पूछा, “क्या हुआ? तुम इतने उदास क्यों हो।” दुखी मन से मर्जुबन ने उस अंगूठी का जिक्र करते हुए अपनी बहन बदौरा के हाल के बारे में बताया। तब शहजादे ने मर्जुबन को अपनी उंगली में वो नीली अंगूठी दिखाई और कहा कि वो मैं ही हूं, जिसे तुम ढूंढ रहे हो। चलो, मुझे जल्दी से उस शहजादी के पास ले चलो।
उसके बाद खुशी होकर शहजादा सबसे पहले अपने पिता के पास गया। अपने बेटे को सालों बाद खुश देखकर बादशाह का चेहरा भी खिल उठा, लेकिन कमरुज्जमां ने अपनी खुशी का कारण अपने पिता को नहीं बताया। पिता शहजादे को चीन जाने की इजाजत नहीं देंगे, इस डर से शहजादे ने कहा कि मुझे एक वर्ष के लिए भ्रमण पर जाना है। बादशाह इतने दिनों के लिए बेटे को खुद से दूर तो नहीं जाने देना चाहते थे, लेकिन इतने दिनों बाद उसे इतना खुश देखकर वो मना नहीं कर पाए और भ्रमण पर जाने की इजाजत दे दी।
पिता की आज्ञा पाकर मर्जुबान के साथ शहजादा चीन के लिए निकल पड़ा। रास्ते में मर्जुबान ने शहजादे कमरुज्जमां से कहा कि आपको हकीम के भेष में वहां जाना होगा, क्योंकि बादशाह ने अपनी बेटी से सिर्फ उसे ठीक करने वाले लोगों से ही मिलने की इजाजत दे रखी है। उन्होंने ऐलान कराया है कि जो भी उनकी बेटी को ठीक करेगा, वो उसकी शादी अपनी बेटी से करा देंगे। वहीं नाकाम होने पर मौत की सजा दे दी जाएगी।
कई महीनों की लंबी यात्रा के बाद कमरुज्जमां चीन पहुंचा हकीम। वहां पहुंच कर मर्जुबन के कहने पर हकीम के कपड़े पहने और बादशाह गोर से मिलने पहुंच गया। कमरुज्जमां ने बादशाह से कहा कि मैं आपकी बेटी को ठीक करने के लिए परदेस से आया हूं। आप जल्दी से मुझे वहां ले जाएं। बादशाह ने कहा कि तुम जैसे बहुत आए और मौत के घाट उतार दिए गए। जाओ, देखते हैं कि तुम क्या करोगे। इतना कहकर बादशाह ने एक सैनिक से कमरुज्जमां को शहजादी बदौरा के पास ले जाने के लिए कहा।
काल कोठरी के पास पहुंचकर कमरुज्जमां रूक गया। सैनिक ने कहा, “अरे क्या हुआ, आप रूक क्यों गए।” तभी उसने एक खत में उस रात की बात और नीली अंगूठी रखकर वहां मौजूद सेविका को देकर कहा कि इसे शहजादी के पास पहुंचा दो। फिर सैनिक की बात का जवाब देते हुए कहा कि मैं उसका इलाज बाहर से ही कर सकता हूं।
सेविका से कमरुज्जमां की चिट्ठी मिलने के बाद शहजादी बदौरा खुशी से फूली नहीं समाई। तब उसने अपनी सेविका से कहा, “मुझे खोल दो। अब मैं बिल्कुल ठीक हूं, मेरे रोग की दवा मिल गई है।” सेविका ने कई सालों से शहजादी को इस तरह मुस्कुराते और हंसते नहीं देखा था। इसलिए उसे भी लगा कि वो ठीक हो गई हैं। यह सोचकर उसने शहजादी की बेड़ियां खोल दीं और खुद भागकर बादशाह को यह खुशखबरी सुनाने चली गई।
इस बीच शहजादी बदौरा काल कोठरी से बाहर खड़े कमरुज्जमां से मिलने पहुंच गई। कमरुज्जमां को सामने देख शहजादी ने उसे गले से लगा लिया और फिर दोनों एक दूसरे से बात करने लगे। वे आपस में बात कर हे रहे थे कि तभी बदौरा के पिता वहां पहुंच गए। उन्होंने कमरुज्जमां से पूछा कि तुमने ऐसा चमत्कार कैसे कर दिखाया। तब कमरुज्जमां ने बादशाह को सब कुछ सच बता दिया।
उसने कहा कि मैं कोई हकीम नहीं हूं। मैं वही लड़का हूं, जिसकी याद में आपकी बेटी आजतक पागल बनी हुई थी। फिर शहजादे ने बादशाह को उस रात के बारे में बताया। यह सब सुनकर बादशाह गोर हैरान हो गए। खैर अब बादशाह को इस बात की खुशी थी कि उनकी बेटी ठीक हो गई है और उन्हें अपनी बेटी के लिए एक खूबसूरत शहजादा भी मिल गया।
